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बंजर होते खेत उत्तराखंड के खाली पड़ते सीढ़ीदार खेत

बंजर होते खेत: खेती क्यों छूट रही है

क्या आप जानते हैं, पहाड़ों में हरे-भरे दिखने वाले कई खेत अब खाली क्यों पड़ने लगे हैं? ये लेख पलायन, बदलते मौसम और खेती से टूटते रिश्ते के पीछे छिपे उस बदलाव के बारे में है, जो धीरे-धीरे पूरे पहाड़ी जीवन को बदल रहा है।

उत्तराखंड में भाऱा घास लेकर लौटती महिलाओं और पहाड़ के रोज़मर्रा श्रम को दर्शाती वास्तविक दृश्य संरचना

एक भाऱा घास: माँ की पीठ पर देखा हुआ पहाड़

पहाड़ की जिंदगी में कई जिम्मेदारियाँ ऐसी थीं, जिन्हें कभी काम के नजरिये से देखा ही नहीं गया। यह लेख उन पहाड़ी महिलाओं के जीवन, मेहनत और यादों को दर्ज करता है, जिनका योगदान अक्सर सामान्य मान लिया जाता था।

पहाड़ी गांव में बातचीत के दौरान संदेश साझा करते ग्रामीणों को दर्शाती रैबार प्रणाली आधारित दृश्य संरचना

रैबार : पहाड़ में चिट्ठी और फोन से पहले का संचार तंत्र

पहाड़ की जिंदगी में खबरें हमेशा सीधे नहीं पहुँचती थीं। यह लेख उस समय की व्यवस्था को याद करता है, जब रास्ते, लोग और भरोसा मिलकर एक ऐसे संचार तंत्र का हिस्सा बनते थे, जिसे पहाड़ में “रैबार” कहा जाता था।

सेवानिवृत्ति के अवसर पर सलामी देते CDS जनरल अनिल चौहान

चार दशक की सैन्य सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए CDS जनरल अनिल चौहान, नई दिल्ली में मिला त्रि-सेवा गार्ड ऑफ ऑनर

देश के दूसरे CDS जनरल अनिल चौहान चार दशक से अधिक की सैन्य सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो गए हैं। नई दिल्ली में त्रि-सेवा गार्ड ऑफ ऑनर के साथ उनकी औपचारिक विदाई हुई, जानिए उनके कार्यकाल के दौरान किन अहम सैन्य बदलावों पर जोर रहा।

हिमालयी बुग्याल में यार्सागुम्बा की तलाश करते स्थानीय लोग

यार्सागुम्बा: आखिर क्यों इसे ‘हिमालय का सोना’ कहा जाता है?

क्या सच में हिमालय में ऐसी चीज मिलती है, जिसकी कीमत सोने जैसी मानी जाती है? यार्सागुम्बा सिर्फ एक दुर्लभ जैविक संरचना नहीं, बल्कि ऊंचे हिमालय में जोखिम, आजीविका और वैश्विक मांग से जुड़ी एक जटिल दुनिया की कहानी भी है।

हिमालयी घर में पारंपरिक लकड़ी के बर्तन में पो चा तैयार करती महिला का दृश्य

पो चा (Butter Tea): सीमांत क्षेत्रों में प्रचलित चाय का इतिहास, संस्कृति और उपयोग

पो चा केवल एक अलग तरह की चाय नहीं थी, बल्कि सीमांत हिमालयी जीवन का हिस्सा थी। नमक, मक्खन और गर्माहट से जुड़ा यह पेय ठंड, मेहनत और पहाड़ी जीवन की जरूरतों के अनुसार कैसे विकसित हुआ, जानिए।

उत्तराखंड के हिमालयी बुग्यालों में भेड़ों के झुंड के साथ चलते भेड़ पालक को दर्शाती दृश्य संरचना

भेड़ पालक: हिमालय में मौसमी प्रवास और पशुपालन की परंपरा

गर्मियों में बुग्यालों की ओर और सर्दियों में निचले इलाकों की तरफ—हिमालय के भेड़ पालकों का जीवन हमेशा चलते रहने वाली एक व्यवस्था रहा है। आखिर कैसे मौसम, रास्ते और पशुपालन मिलकर इस पूरी जीवन-पद्धति को आकार देते थे?

उत्तराखंड के नौला-धारा और पारंपरिक पहाड़ी जल व्यवस्था को दर्शाती दृश्य संरचना

नौला-धारा: पहाड़ की जल-व्यवस्था का आधार

नौला और धारा कभी पहाड़ की जल-व्यवस्था की रीढ़ हुआ करते थे। पानी लाने से लेकर स्रोत बचाने तक, यह केवल सुविधा नहीं बल्कि सामुदायिक समझ और संतुलन पर आधारित व्यवस्था थी।

उत्तराखंड के पुराने लकड़ी और रस्सियों से बने पुलों और पहाड़ी संपर्क व्यवस्था को दर्शाती दृश्य संरचना

पुराने पुल: लकड़ी और रस्सियों से बने मार्ग

लकड़ी और रस्सियों से बने पुराने पुल कभी पहाड़ की आवाजाही की अहम कड़ी हुआ करते थे। सीमित संसाधनों के बीच बने ये मार्ग केवल नदी पार करने का साधन नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी जीवन को जोड़ने वाली व्यवस्था थे।

उत्तरकाशी के जाड़ समुदाय और सीमांत जीवन में आए बदलाव को दर्शाती दृश्य संरचना

जाड़ (Jadh) लोग: 1962 के बाद बदलती एक सीमावर्ती ज़िंदगी

जाड़ (Jadh) समुदाय की कहानी केवल एक सीमावर्ती समाज की नहीं, बल्कि बदलते भूगोल, सीमाओं और जीवन-शैली की भी कहानी है। 1962 के बाद कैसे बदला उनका जीवन, यह समझना उत्तराखंड के सीमांत इतिहास को समझने जैसा है।