1962 से पहले भारत-तिब्बत सीमा आज की तरह औपचारिक और सख़्त निगरानी वाली रेखा नहीं थी। उत्तराखंड के सीमांत क्षेत्रों-जैसे नेलांग, जादुंग, माणा, नीति-में सीमा की निगरानी किसी एक संस्था के हाथ में नहीं थी, बल्कि यह एक मिश्रित व्यवस्था थी, जिसमें स्थानीय समुदाय, प्रशासन और सीमित सैन्य उपस्थिति-तीनों की भूमिका होती थी।
सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले समुदायों की थी-जैसे जाड़ (Jadh) और भोटिया समूह। ये लोग केवल निवासी नहीं थे, बल्कि सीमा के प्राकृतिक संरक्षक भी थे। उनका तिब्बत के साथ नियमित आवागमन और व्यापार होता था, जिससे उन्हें रास्तों, दर्रों और गतिविधियों की पूरी जानकारी रहती थी।
उस समय “निगरानी” का अर्थ आज की तरह चौकियों और हथियारबंद गश्त नहीं था। यह अधिकतर स्थानीय जानकारी और निरंतर आवाजाही पर आधारित व्यवस्था थी। यदि किसी अनजान व्यक्ति या असामान्य गतिविधि की जानकारी मिलती, तो यह बात तुरंत आसपास के गाँवों या प्रशासन तक पहुँचती थी।
ब्रिटिश काल में सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए एक अलग प्रशासनिक ढांचा भी बनाया गया था। कुछ क्षेत्रों में “फ्रंटियर पुलिस” या स्थानीय मिलिशिया जैसी व्यवस्थाएँ थीं, जिनका काम सीमित स्तर पर निगरानी रखना और सूचनाएँ देना था। लेकिन इनकी उपस्थिति पूरे क्षेत्र में एकसमान नहीं थी।
इसके अलावा, कुछ स्थानों पर सेना की छोटी-छोटी टुकड़ियाँ या चौकियाँ मौजूद रहती थीं, लेकिन उनका दायरा सीमित था। पहाड़ों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण लगातार और व्यापक सैन्य निगरानी संभव नहीं थी।
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असल में, उस समय की व्यवस्था तीन स्तरों पर काम करती थी:
- स्थानीय समुदाय → रास्तों और गतिविधियों की जानकारी
- प्रशासन (ब्रिटिश/राज्य) → सूचना एकत्र करना और नियंत्रण
- सीमित सैन्य उपस्थिति → आवश्यकता पड़ने पर हस्तक्षेप
यह भी ध्यान देने योग्य है कि उस समय सीमा “कड़ी रेखा” के रूप में नहीं, बल्कि एक संक्रमण क्षेत्र (buffer zone) की तरह काम करती थी। व्यापारिक रास्ते खुले थे, और लोगों की आवाजाही नियंत्रित तो थी, लेकिन पूरी तरह बंद नहीं थी।
1962 के भारत-चीन युद्ध ने इस पूरी व्यवस्था को बदल दिया। इसके बाद सीमाओं को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया और उनकी सुरक्षा के लिए विशेष बल की आवश्यकता महसूस हुई। इसी संदर्भ में ITBP (Indo-Tibetan Border Police) की स्थापना 24 अक्टूबर, 1962 को की गई, जिसने सीमा सुरक्षा को संगठित और संस्थागत रूप दिया।
आज जहाँ आधुनिक चौकियाँ, गश्त और तकनीकी निगरानी मौजूद है, वहीं पहले यह व्यवस्था अधिक मानवीय नेटवर्क और स्थानीय समझ पर आधारित थी।
इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि ITBP से पहले सीमा “अनदेखी” नहीं थी-बल्कि वह एक अलग तरीके से देखी और समझी जाती थी।
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