मसूरी, 17 जुलाई। झड़ीपानी में रेलवे भूमि को लेकर वर्षों से चला आ रहा विवाद एक बार फिर स्थानीय परिवारों के घरों तक पहुंच गया है। उत्तर रेलवे की टीम ने 16 जुलाई को क्षेत्र में पहुंचकर कई लोगों को नोटिस दिए और जमीन पर अपने अधिकार से जुड़े दस्तावेज तथा जवाब सात दिन के भीतर संपदा अधिकारी के सामने रखने को कहा।
नोटिस मिलने के बाद क्षेत्र में विरोध शुरू हो गया। स्थानीय लोगों का दावा है कि वे लंबे समय से यहां रह रहे हैं, उनके मकानों की रजिस्ट्री है, नगर पालिका में नामांतरण दर्ज है और वे नियमित रूप से कर जमा करते आए हैं। दूसरी ओर रेलवे संबंधित निर्माणों को अपनी भूमि पर अनधिकृत कब्जा बता रहा है।
इस कार्रवाई को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सात दिन पूरे होते ही परिवारों को घर खाली करने होंगे। उपलब्ध कानूनी प्रक्रिया के अनुसार यह अभी अंतिम बेदखली आदेश नहीं, बल्कि संबंधित लोगों को अपना पक्ष और दस्तावेज पेश करने का अवसर देने वाला चरण है।
यदि 16 जुलाई को जारी नोटिस में जवाब देने के लिए पूरे सात दिन तय किए गए हैं, तो यह अवधि 23 जुलाई को पूरी होगी। हालांकि प्रत्येक परिवार के लिए अंतिम तारीख वही मानी जाएगी, जो उसके नोटिस में लिखी गई है।
सार्वजनिक परिसर अधिनियम, 1971 के तहत संपदा अधिकारी पहले यह जानना चाहते हैं कि संबंधित कब्जे को अनधिकृत मानकर बेदखली का आदेश क्यों न जारी किया जाए। परिवारों की ओर से दिए गए जवाब, भूमि संबंधी दस्तावेज और सुनवाई के दौरान रखे गए पक्ष पर विचार करने के बाद ही आगे का फैसला हो सकता है।
इसका अर्थ यह है कि सात दिन की अवधि पूरी होने भर से मकान हटाने की कार्रवाई स्वतः शुरू नहीं हो जाएगी। यदि कोई परिवार समय पर जवाब नहीं देता या संपदा अधिकारी उसके दावे और दस्तावेजों से संतुष्ट नहीं होते, तो आगे अलग से बेदखली आदेश जारी किया जा सकता है।
स्थानीय परिवारों के लिए रजिस्ट्री उनके दावे का महत्वपूर्ण आधार हो सकती है, लेकिन अकेले इसी दस्तावेज से विवाद का परिणाम तय नहीं होगा। यह भी देखा जाएगा कि जमीन बेचने वाले व्यक्ति या संस्था के पास उसे बेचने का अधिकार था या नहीं, रजिस्ट्री में दर्ज भूखंड और सीमाएं मौके की जमीन से मेल खाती हैं या नहीं और रेलवे के संपत्ति अभिलेख क्या बताते हैं।
नगर पालिका में नामांतरण, भवन कर, बिजली या पानी के पुराने रिकॉर्ड यह दिखा सकते हैं कि परिवार लंबे समय से संपत्ति का उपयोग कर रहे हैं। इसके बावजूद ये दस्तावेज हर स्थिति में मूल स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं माने जाते। अंतिम स्थिति के लिए मूल भूमि रिकॉर्ड, पुराने हस्तांतरण दस्तावेज, नक्शे और दोनों पक्षों के सीमांकन का मिलान जरूरी होगा।
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फिलहाल यह सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है कि कुल कितने परिवारों को नोटिस दिया गया है, विवादित भूमि कितने क्षेत्र में फैली है और रेलवे ने किन खसरा या भूखंड संख्याओं के आधार पर अपना दावा रखा है। रेलवे की ओर से मौके पर विस्तृत सार्वजनिक बयान भी सामने नहीं आया।
इस विवाद की जड़ें केवल जुलाई की कार्रवाई तक सीमित नहीं हैं। जून 2026 में भी रेलवे से जुड़ी एक टीम जेसीबी लेकर झड़ीपानी में एक दुकान हटाने पहुंची थी। स्थानीय लोगों के विरोध के बाद उस समय कार्रवाई रोक दी गई थी।
निवासियों का कहना है कि क्षेत्र का पहले भी सीमांकन हो चुका है और उनकी संपत्तियां रेलवे की सीमा में नहीं आतीं। हालांकि सीमांकन से जुड़े आधिकारिक रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होने के कारण इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
झड़ीपानी स्थित ओक ग्रोव स्कूल भारतीय रेलवे के स्वामित्व और संचालन में है। रेलवे इसी एस्टेट और उससे जुड़े भूमि रिकॉर्ड के आधार पर क्षेत्र में अपना अधिकार बताता रहा है। लेकिन ओक ग्रोव एस्टेट का रेलवे के अधीन होना अपने आप यह सिद्ध नहीं करता कि नोटिस पाने वाला हर मकान उसी सीमा के भीतर है। इसका फैसला भूखंडवार अभिलेख और सीमांकन से ही होगा।
अब प्रभावित परिवारों को नोटिस में तय समय के भीतर अपने दावे के समर्थन में उपलब्ध रजिस्ट्री, भूमि रिकॉर्ड और अन्य संबंधित प्रमाण संपदा अधिकारी के सामने रखने होंगे। दस्तावेज जमा किए जाने और सुनवाई में पक्ष रखे जाने के बाद ही यह तय होगा कि कार्यवाही समाप्त की जाती है या बेदखली का अलग आदेश जारी होता है।
यदि संपदा अधिकारी बेदखली का आदेश देते हैं, तब भी प्रभावित पक्ष के पास कानून के तहत जिला न्यायाधीश या नामित न्यायिक अधिकारी के समक्ष अपील करने का विकल्प रहेगा। अपीलीय अधिकारी मामले की परिस्थितियों के आधार पर आदेश के क्रियान्वयन पर रोक भी लगा सकते हैं।
इसलिए झड़ीपानी के परिवारों के घरों का भविष्य केवल सात दिन की समयसीमा से तय नहीं होगा। निर्णायक सवाल यह होगा कि उनकी रजिस्ट्री और भूमि की पहचान रेलवे के अभिलेखों तथा मौके की सीमाओं से मेल खाती है या नहीं। आने वाले दिनों में संपदा अधिकारी के सामने पेश होने वाले यही रिकॉर्ड वर्षों पुराने इस विवाद की अगली दिशा तय करेंगे।
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