लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल में दिखाई जाएगी उत्तराखंड की ‘This Tree Won’t Fall’, चिपको आंदोलन की सुदेशा देवी पर बनी है फिल्म

उत्तराखंड के चिपको आंदोलन से प्रेरित सुदेशा देवी की कहानी अब अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने जा रही है। लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल में चयनित यह डॉक्यूमेंट्री केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि हिमालय, जंगलों और ग्रामीण महिलाओं के पर्यावरणीय संघर्ष की वैश्विक पहचान भी है। जानिए इस चयन को क्यों माना जा रहा है खास।
Sudesha Devi featured alongside the poster of This Tree Won't Fall and the London Indian Film Festival logo.

देहरादून, 13 जुलाई। उत्तराखंड के चिपको आंदोलन से जुड़ी सुदेशा देवी की कहानी अब लंदन के दर्शकों तक पहुंचने जा रही है। फिल्मकार दीपक रमोला की लघु डॉक्यूमेंट्री ‘This Tree Won’t Fall’ का चयन लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल 2026 की सत्यजीत रे लघु फिल्म प्रतियोगिता में हुआ है। फिल्म का प्रदर्शन 15 जुलाई को शाम 6:30 बजे लंदन के नेहरू सेंटर में किया जाएगा।

करीब 20 मिनट की यह फिल्म हिंदी और गढ़वाली भाषा में बनी है और इसे अंग्रेजी उपशीर्षकों के साथ दिखाया जाएगा। फिल्म सुदेशा देवी के जीवन, पर्यावरण के प्रति उनकी समझ और चिपको आंदोलन से जुड़ी उनकी भूमिका को केंद्र में रखती है।

सुदेशा देवी उन ग्रामीण महिलाओं में शामिल रही हैं, जिन्होंने हिमालयी क्षेत्रों में जंगलों की कटाई और उसके स्थानीय जीवन पर पड़ने वाले प्रभावों के खिलाफ आवाज उठाई। उनके लिए जंगल केवल लकड़ी या ईंधन का स्रोत नहीं, बल्कि पानी, खेती, पशुपालन और ग्रामीण जीवन का आधार थे।

फिल्म का शीर्षक ‘This Tree Won’t Fall’ इसी प्रतिरोध और दृढ़ता की ओर संकेत करता है। डॉक्यूमेंट्री सुदेशा देवी को केवल इतिहास के एक पात्र के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव और पर्यावरणीय समझ से जुड़ी जीवंत आवाज के रूप में सामने लाती है।

फिल्म का निर्देशन दीपक रमोला ने किया है। अपूर्वा बख्शी और मोनिशा त्यागराजन भी इससे निर्माता के रूप में जुड़ी हैं। फिल्म को तैयार करने में करीब चार वर्ष लगे।

वर्ष 2024 में इस डॉक्यूमेंट्री को राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम के फिल्म बाजार के व्यूइंग रूम में जगह मिली थी। यह Film Bazaar Recommends 2024 की 27 चयनित फिल्मों में भी शामिल रही। वहां फिल्म को महिलाओं और पर्यावरण के रिश्ते तथा जमीनी आंदोलनों में उनकी भूमिका को सामने लाने वाली रचना के रूप में प्रस्तुत किया गया।

सुदेशा देवी की कहानी पहले भी फिल्मी दस्तावेज का हिस्सा रह चुकी है। वर्ष 1983 में युगांतर फिल्म कलेक्टिव की फिल्म ‘Sudesha’ ने उनके पारिवारिक जीवन, जंगल बचाने के संघर्ष, विरोध प्रदर्शनों, पुलिस कार्रवाई और जेल जाने तक के अनुभवों को दर्ज किया था।

नई डॉक्यूमेंट्री दशकों बाद उसी जीवन और संघर्ष को आज की पीढ़ी के सामने नए सिनेमाई रूप में रखती है। लंदन में इसका प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह चिपको आंदोलन की उन ग्रामीण महिला आवाजों को केंद्र में लाता है, जिनके योगदान का सार्वजनिक स्मृति में अक्सर सीमित उल्लेख मिलता है।

उत्तराखंड के लिए यह चयन केवल एक फिल्म की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस पर्यावरणीय सोच की अंतरराष्ट्रीय प्रस्तुति भी है, जिसने बहुत पहले यह समझ लिया था कि जंगलों की रक्षा गांवों के पानी, मिट्टी, आजीविका और भविष्य की रक्षा से जुड़ी है।

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