जिस समाज में हर कोई बोल रहा है, वहाँ सुन कौन रहा है?

हम बातचीत नहीं करते, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं। हम सुनते नहीं, उत्तर तैयार करते हैं। शायद हमारे समय की बहुत-सी समस्याएँ विचारों की कमी से नहीं, सुनने की कमी से पैदा हुई हैं। और जब सुनना कम होने लगता है, तो संवाद धीरे-धीरे प्रतिध्वनि में बदल जाता है। इस लेख में इसी प्रश्न पर एक विचार।
पारंपरिक गढ़वाली गांव में चर्चा के दौरान अन्य लोगों की बात ध्यान से सुनता एक बुजुर्ग ग्रामीण।

शायद हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं है कि लोग बहुत बोलने लगे हैं।

विडंबना यह है कि लोग सुनना भूलने लगे हैं।

किसी समय बातचीत दो लोगों के बीच होती थी। एक बोलता था, दूसरा सुनता था। फिर भूमिकाएँ बदल जाती थीं। संवाद का अर्थ ही था कि दो चेतनाएँ एक-दूसरे तक पहुँचने का प्रयास कर रही हैं। बातचीत का मूल स्वभाव आदान-प्रदान था, प्रदर्शन नहीं। संवाद में धैर्य था, प्रतीक्षा थी, और यह स्वीकार भी कि सामने वाले के पास शायद कोई ऐसी बात हो जो हमें नहीं पता। सुनना बातचीत का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा था जितना बोलना।

लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदल गया।

आज हर व्यक्ति के पास एक मंच है। हर हाथ में एक माध्यम है। हर विचार को तुरंत व्यक्त कर देने की सुविधा है। शायद इतिहास में पहली बार इतना बड़ा समाज एक साथ बोल रहा है। लोग अपने विचार लिख रहे हैं, रिकॉर्ड कर रहे हैं, प्रसारित कर रहे हैं, साझा कर रहे हैं। हर कोई सुना जाना चाहता है।

लेकिन इसी शोर के बीच एक अजीब सन्नाटा पैदा हो गया है।

सुनने का सन्नाटा।

हम बातचीत नहीं करते, अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं।

हम सुनते नहीं, उत्तर तैयार करते हैं।

हम समझना नहीं चाहते, केवल अपनी बात मनवाना चाहते हैं।

कभी-कभी लगता है कि हम एक-दूसरे से नहीं, एक-दूसरे के सामने बोल रहे हैं।

यह केवल तकनीक की समस्या नहीं है। यह मनुष्य के अहंकार की भी कहानी है। बोलने में एक सुख है। अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का सुख। अपने विचारों को महत्वपूर्ण मानने का सुख। लेकिन सुनना एक कठिन क्रिया है। सुनने के लिए अपने अहंकार को थोड़ी देर के लिए पीछे हटाना पड़ता है। यह स्वीकार करना पड़ता है कि सामने वाले के पास भी कोई सत्य हो सकता है।

और शायद यही कारण है कि सुनना दुर्लभ होता जा रहा है।

आज लोग अपने विचारों से घिरे हुए हैं। वे उन्हीं लोगों को पढ़ते हैं जो उनकी तरह सोचते हैं। उन्हीं लोगों को सुनते हैं जो उनकी बातों की पुष्टि करते हैं। धीरे-धीरे संवाद का स्थान प्रतिध्वनि ने ले लिया है। हर व्यक्ति अपनी ही आवाज़ बार-बार सुन रहा है और उसे लग रहा है कि पूरी दुनिया उससे सहमत है।

लेकिन कोई भी समाज केवल बोलने से नहीं बनता।

समाज सुनने से बनता है।

समाज तब बनता है जब एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को सुनती है। जब शहर गाँव को सुनता है। जब युवा बुज़ुर्गों को सुनते हैं और बुज़ुर्ग युवाओं की बेचैनियों को समझने की कोशिश करते हैं। कुछ समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण तो समाज को मूलतः संचार का एक जाल मानते हैं—ऐसा जाल जो केवल संदेश भेजने से नहीं, बल्कि उन्हें ग्रहण करने से भी बनता है।

मुझे कभी-कभी लगता है कि हमारे समय की बहुत-सी समस्याएँ विचारों की कमी से नहीं, सुनने की कमी से पैदा हुई हैं।

हर पक्ष बोल रहा है।

हर समूह बोल रहा है।

हर व्यक्ति बोल रहा है।

लेकिन सुन कौन रहा है?

शायद इसी पीड़ा को सदियों पहले संतों और चिंतकों ने भी महसूस किया था। वे बार-बार बोलने से अधिक सुनने पर ज़ोर देते रहे। क्योंकि वे जानते थे कि मनुष्य की सबसे बड़ी क्षमता बोलना नहीं, समझना है। और समझ हमेशा सुनने से शुरू होती है।

किसी सभ्यता का स्तर इस बात से नहीं मापा जाता कि उसके पास कितने वक्ता हैं।

उसका स्तर इस बात से मापा जाता है कि उसके पास कितने श्रोता हैं।

और यदि किसी दिन ऐसा समय आ जाए जब हर कोई बोल रहा हो और कोई सुनने वाला न बचे, तो शोर बहुत होगा, लेकिन संवाद नहीं।

और जहाँ संवाद नहीं होता, वहाँ समाज धीरे-धीरे भीड़ में बदल जाता है।

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