पहाड़ छोड़ने वाले लोग पहाड़ को सबसे ज़्यादा क्यों याद करते हैं?

शहर में बस जाने के वर्षों बाद अचानक किसी बरसाती शाम में मिट्टी की गंध के साथ गाँव याद आ जाता है। किसी पहाड़ी शब्द, किसी त्योहार या किसी पुराने रास्ते की स्मृति मन को वहीं ले जाती है जहाँ से जीवन की शुरुआत हुई थी। शायद हम हमेशा जगहों को नहीं, अपने भीतर छूटे हुए हिस्सों को याद करते हैं। इस लेख में इसी अनुभव पर एक विचार।
गढ़वाल के एक गांव में स्थित पारंपरिक पत्थर और मिट्टी का घर, जिसके बाहर रोजमर्रा की उपयोग की वस्तुएं दिखाई दे रही हैं।

पहाड़ में रहते हुए बहुत कम लोग पहाड़ को देखते हैं।

उन्हें दिखाई देती है रोज़ की चढ़ाई। पानी भरने की परेशानी। अस्पताल की दूरी। रोजगार की कमी। सर्दियों की ठिठुरन। बरसात में टूटती सड़कें। पहाड़ तब एक सुंदर दृश्य नहीं होता, वह जीवन होता है। और जीवन को कोई पोस्टकार्ड की तरह नहीं देखता।

शायद इसी कारण पहाड़ छोड़ने का निर्णय अचानक नहीं होता। वह वर्षों के छोटे-छोटे समझौतों से बनता है। कोई पढ़ाई के लिए निकलता है, कोई नौकरी के लिए, कोई बच्चों के भविष्य के लिए। जाते समय अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि वे केवल एक जगह छोड़ रहे हैं। लेकिन बाद में पता चलता है कि उन्होंने केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं छोड़ा था।

उन्होंने अपने जीवन की एक भाषा छोड़ दी थी।

मनुष्य अजीब है। जब कोई चीज़ उसके पास होती है, वह उसे सामान्य मान लेता है। उसकी कीमत तब समझ आती है जब वह उसकी पहुँच से बाहर हो जाती है। यही कारण है कि शहर में बस जाने के वर्षों बाद अचानक किसी बरसाती शाम में मिट्टी की गंध के साथ गाँव याद आ जाता है। किसी ढाबे में पहाड़ी बोली का एक शब्द सुनकर मन ठिठक जाता है। किसी त्योहार पर छुट्टी न मिलने पर याद आता है कि गाँव में इस दिन पूरा इलाका जागता था।

स्मृति की अपनी एक राजनीति होती है।

वह कठिनाइयों को धीरे-धीरे धुंधला कर देती है और भावनाओं को बचाकर रखती है।

यही कारण है कि जो व्यक्ति कभी पानी के लिए आधा किलोमीटर नीचे धारे तक जाता था, वही बाद में शहर में बैठकर उस धारे को याद करता है। जो व्यक्ति कभी खेतों में काम करने से बचना चाहता था, वही वर्षों बाद खेतों की तस्वीरें देखकर भावुक हो जाता है।

वह पहाड़ को नहीं याद कर रहा होता।

वह अपने उस हिस्से को याद कर रहा होता है जो पहाड़ में रह गया।

क्योंकि गाँव केवल घरों का समूह नहीं होता। वह हमारी पहली आवाज़ों का स्थान होता है। वहीं हम पहली बार किसी नदी का नाम सीखते हैं। पहली बार किसी पेड़ पर चढ़ते हैं। पहली बार किसी मेले में जाते हैं। पहली बार किसी रिश्ते का अर्थ समझते हैं। पहाड़ की पगडंडियाँ केवल रास्ते नहीं होतीं, वे स्मृतियों की रेखाएँ होती हैं।

शहर मनुष्य को अवसर देता है।

लेकिन यादें नहीं देता।

यादें हमेशा किसी और जगह की होती हैं।

शायद यही कारण है कि पहाड़ छोड़ने वाले लोग पहाड़ को सबसे अधिक याद करते हैं। जो लोग आज भी वहीं रहते हैं, उनके लिए पहाड़ वर्तमान है। लेकिन जो चले गए, उनके लिए पहाड़ याद बन गया है। और कई बार यादें वास्तविकता से अधिक शक्तिशाली होती हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति लौटना चाहता है।

बहुत से लोग जानते हैं कि उनका भविष्य अब शहरों में है। उनके बच्चों का जीवन, उनका काम, उनकी दुनिया सब बदल चुकी है। लेकिन इसके बावजूद भीतर कहीं एक कोना ऐसा रहता है जहाँ एक गाँव अब भी बसा होता है। एक पगडंडी अब भी जाती है। एक घर अब भी खुलता है। एक आँगन अब भी धूप से भरा है।

समय बीतता जाता है।

गाँव बदल जाते हैं।

लोग बदल जाते हैं।

लेकिन यादों का पहाड़ अक्सर वहीं खड़ा रहता है जहाँ हमने उसे छोड़ा था।

शायद इसलिए पहाड़ छोड़ने वाले लोग पहाड़ को सबसे ज़्यादा याद करते हैं।

क्योंकि वे केवल पहाड़ को नहीं, अपने बीते हुए जीवन को याद कर रहे होते हैं।

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