एक दिन अचानक ध्यान गया कि मैंने आख़िरी बार आकाशगंगा कब देखी थी।
बहुत सोचा। कोई जवाब नहीं मिला। फिर याद आया कि बचपन में यह सवाल कभी पूछा ही नहीं जाता था। रात होती थी, तो आसमान अपने आप दिखाई देता था। तारे इतने होते थे कि उन्हें गिनने की कोशिश ही छोड़ देते थे। कभी कोई टूटता तारा दिख जाता, कभी दूधिया-सी एक लंबी पट्टी आसमान के बीचों-बीच फैली दिखाई देती। तब यह नहीं पता था कि उसे आकाशगंगा कहते हैं। बस इतना जानते थे कि रात ऐसी ही होती है।
फिर शहर आ गए।
अब रात भी होती है, लेकिन अँधेरा नहीं होता।
पहले लगा कि यह केवल एक एहसास है। लेकिन जब इसके बारे में पढ़ा, तो पता चला कि दुनिया के बड़े हिस्से में रहने वाले लोग अब वैसा रात का आसमान देख ही नहीं पाते, जैसा उनके दादा-दादी देखा करते थे। इसका कारण बादल नहीं हैं, बल्कि हमारी अपनी रोशनी है।
यह सुनने में थोड़ा अजीब लगता है कि रोशनी भी समस्या हो सकती है।
हमने हमेशा अँधेरे को डर से जोड़ा और रोशनी को सुरक्षा से। इसलिए जहाँ भी मौका मिला, हमने रात को रोशन कर दिया। सड़कें, इमारतें, विज्ञापन बोर्ड, पार्क, स्टेडियम, कॉलोनियाँ—सब चमकने लगे। हमें लगा कि हमने रात पर जीत हासिल कर ली।
लेकिन प्रकृति शायद इस जीत के लिए तैयार नहीं थी।
रात केवल सूरज के डूबने का नाम नहीं है। वह भी प्रकृति का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है, जितना दिन। लाखों जीव ऐसे हैं जिनकी पूरी दुनिया रात में जागती है। उल्लू, चमगादड़, अनेक पतंगे, कीट और कई छोटे जीव अपने भोजन, दिशा और जीवनचक्र के लिए प्राकृतिक अँधेरे पर निर्भर रहते हैं। लगातार कृत्रिम रोशनी उनके व्यवहार को बदल देती है। कुछ रास्ता भटक जाते हैं, कुछ भोजन नहीं खोज पाते और कुछ का प्रजनन चक्र तक प्रभावित होता है।
शायद इसी कारण वैज्ञानिक आज “प्रकाश प्रदूषण” को भी प्रदूषण की एक गंभीर श्रेणी मानते हैं।
फिर मन में एक और सवाल आया।
क्या हमने केवल अँधेरा खोया है?
या उससे कहीं ज़्यादा?
जब शहर की रात कभी पूरी तरह अँधेरी नहीं होती, तो हम केवल तारे नहीं खोते। हम समय का एक अनुभव खो देते हैं। रात की वह शांति खो देते हैं जिसमें हवा की आवाज़ तक सुनाई देती थी। वह आकाश खो देते हैं, जिसे देखकर मनुष्य ने हजारों वर्षों तक दिशाएँ तय कीं, ऋतुएँ समझीं और ब्रह्मांड के बारे में सोचना शुरू किया।
शायद यही कारण है कि पहाड़ की रात अलग महसूस होती है।
वहाँ अँधेरा ज़्यादा नहीं होता।
वहाँ अँधेरा बचा हुआ होता है।
जहाँ कृत्रिम रोशनी कम होती है, वहाँ आसमान फिर से अपना असली रूप दिखाता है। तारे अचानक बढ़ नहीं जाते। वे तो हमेशा से वहीं होते हैं। बदलता केवल इतना है कि अब उनके और हमारी आँखों के बीच शहर की रोशनी नहीं होती।
यह विडंबना भी कम दिलचस्प नहीं है कि जिस सभ्यता ने सूरज तक पहुँचने की तकनीक बना ली, वही सभ्यता अब अपने ही बच्चों को असली रात नहीं दिखा पा रही।
हो सकता है आने वाले समय में किसी बच्चे के लिए आकाशगंगा केवल विज्ञान की किताब में छपी एक तस्वीर रह जाए। वह यह जान तो ले कि वह हमारी आकाशगंगा है, लेकिन उसे अपनी आँखों से कभी देख न पाए।
शायद उस दिन हमें पहली बार एहसास होगा कि हमने रात को रोशन तो बहुत कर लिया, लेकिन उसे समझना कहीं पीछे छोड़ दिया।
क्योंकि हर अँधेरा डर नहीं होता।
कुछ अँधेरे ऐसे भी होते हैं, जिनमें पूरी प्रकृति चैन की साँस लेती है।
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