एक बात कई दिनों से मन में घूम रही थी। किसी शहर की तरक्की कैसे मापी जाए?
पहले लगा, इसका जवाब आसान है। चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें, चमचमाती रोशनी, मेट्रो, फ्लाईओवर, बड़े-बड़े मॉल और लगातार बढ़ती आबादी। यही तो किसी विकसित शहर की पहचान मानी जाती है। लेकिन फिर एक सवाल आया—अगर यही तरक्की है, तो कुछ पक्षी इन शहरों में रहना क्यों छोड़ देते हैं?
पक्षी कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते। वे किसी अख़बार में लेख नहीं लिखते। न किसी सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते हैं और न ही किसी अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हैं। वे केवल एक काम करते हैं। जब उन्हें लगता है कि यह जगह अब उनके रहने लायक नहीं रही, तो वे चुपचाप उड़ जाते हैं।
और कई बार उनकी यह चुप्पी, इंसानों के सबसे बड़े शोर से भी ज़्यादा कुछ कह जाती है।
बचपन में सुबह की पहचान घड़ी से कम और आवाज़ों से ज़्यादा होती थी। घर की मुंडेर पर बैठी गौरैया, किसी पेड़ से आती बुलबुल की आवाज़, दूर कहीं कोयल की कूक और शाम को तारों पर बैठते पक्षियों का शोर। उस समय किसी ने इन आवाज़ों पर ध्यान नहीं दिया। शायद इसलिए कि वे हमेशा थीं।
मनुष्य की एक पुरानी आदत है। जो चीज़ हमेशा मिलती रहती है, उसकी कीमत सबसे आख़िर में समझ आती है।
धीरे-धीरे शहर बदलने लगे। पेड़ों की जगह पार्किंग बनने लगी। खाली मैदानों की जगह इमारतें उग आईं। पुराने मकानों की छतों और रोशनदानों की जगह चिकनी काँच की दीवारों ने ले ली। हर खाली जगह को उपयोगी बना दिया गया। बस एक बात भूल गए—हर खाली जगह इंसानों के लिए खाली नहीं होती।
किसी पेड़ की एक डाल, किसी पुराने मकान की छोटी-सी दरार, किसी छज्जे का कोना भी किसी का घर हो सकता है।
फिर एक दिन खबरें आने लगीं कि गौरैया कम हो रही है।
शुरुआत में लगा कि यह केवल एक पक्षी की कहानी है। लेकिन धीरे-धीरे समझ आया कि बात केवल गौरैया की नहीं है। जहाँ कीड़े कम होंगे, वहाँ उन्हें खाने वाले पक्षी भी कम होंगे। जहाँ पुराने पेड़ नहीं बचेंगे, वहाँ घोंसले भी कम होंगे। जहाँ रात कभी अँधेरी ही नहीं होगी, वहाँ उन जीवों का जीवन भी बदल जाएगा जो अँधेरे पर निर्भर हैं।
प्रकृति में शायद ही कोई जीव बिना कारण कोई जगह छोड़ता हो।
इंसान मकान देखकर बसता है।
पक्षी वातावरण देखकर।
यही कारण है कि किसी शहर के पक्षी, उस शहर के सबसे ईमानदार निवासी होते हैं। उन्हें न चुनाव लड़ना होता है, न कारोबार करना होता है, न ज़मीन खरीदनी होती है। उन्हें केवल इतना चाहिए कि भोजन मिले, सुरक्षित घोंसला मिले और जीवन का स्वाभाविक क्रम बना रहे। जब ये तीनों चीज़ें एक-एक करके खत्म होने लगती हैं, तो वे बिना किसी शिकायत के शहर छोड़ देते हैं।
कई वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि शहरीकरण, पुराने पेड़ों की कटाई, कीटनाशकों के बढ़ते उपयोग, ध्वनि प्रदूषण, कृत्रिम रोशनी और काँच की ऊँची इमारतों का असर अनेक पक्षी प्रजातियों पर पड़ता है। कुछ पक्षी नए वातावरण के अनुसार स्वयं को ढाल लेते हैं, लेकिन सभी ऐसा नहीं कर पाते। जो नहीं कर पाते, वे धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि जब किसी शहर से पक्षी कम होते हैं, तो शुरुआत में इंसानों का जीवन लगभग वैसा ही चलता रहता है। दफ़्तर खुलते हैं। बाज़ार सजते हैं। गाड़ियाँ दौड़ती हैं। किसी को लगता भी नहीं कि कुछ बदल रहा है। लेकिन प्रकृति का हिसाब मनुष्य के कैलेंडर से नहीं चलता। वह धीरे-धीरे अपना असर दिखाती है।
कभी कीड़ों की संख्या बदलती है।
कभी पेड़ों का परागण प्रभावित होता है।
कभी सुबह की आवाज़ें कम हो जाती हैं।
और कभी बच्चों की किताबों में दिखने वाली चिड़िया, उनकी खिड़की पर दिखाई देना बंद कर देती है।
शायद किसी शहर की असली तरक्की केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वहाँ कितनी ऊँची इमारतें हैं। यह भी देखना चाहिए कि वहाँ अब भी कितनी चिड़ियाँ लौटकर आती हैं।
क्योंकि इमारतें इंजीनियर बनाते हैं।
लेकिन किसी शहर को रहने लायक घोषित करने का काम शायद आज भी पक्षी ही करते हैं।
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