क्या पहाड़ सच में शहरों से पीछे हैं? विकास को आखिर मापा कैसे जाता है?

रोजगार, अस्पताल और उच्च शिक्षा की कमी पहाड़ की वास्तविक चुनौतियां हैं, लेकिन विकास की पूरी तस्वीर केवल आय और सुविधाओं से नहीं बनती। जंगल, पानी, जैव विविधता और जीवन की गुणवत्ता जैसे सवाल भी सामने आते हैं - और यहीं से यह बहस बदलने लगती है कि आखिर किसे विकसित माना जाए।
Illustrated comparison of a Uttarakhand mountain village and a modern city representing different dimensions of development.

पहाड़ के किसी छोटे गांव से निकलकर जब कोई व्यक्ति देहरादून, दिल्ली या किसी दूसरे बड़े शहर पहुंचता है तो अंतर साफ दिखाई देता है।

शहर में बड़े अस्पताल हैं, अच्छे कॉलेज हैं, रोजगार के ज्यादा विकल्प हैं, चौड़ी सड़कें हैं, बाजार हैं और लगभग हर जरूरत की सेवा कुछ दूरी पर मिल जाती है।

इसके मुकाबले पहाड़ के कई गांवों में अस्पताल दूर है, उच्च शिक्षा के विकल्प सीमित हैं, नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता है और कई बुनियादी सेवाओं तक पहुंच कठिन है।

ऐसे में एक सामान्य निष्कर्ष निकलता है:

शहर विकसित हैं और पहाड़ पीछे हैं।

लेकिन क्या विकास को समझने का यही सही तरीका है?

अगर किसी जगह पर बड़े अस्पताल और बाजार नहीं हैं तो वह पिछड़ी है, लेकिन अगर दूसरी जगह साफ पानी, जंगल, कम भीड़, मजबूत स्थानीय समुदाय और प्राकृतिक संसाधन हैं तो क्या उनका विकास में कोई मूल्य नहीं?

असल सवाल शायद यह है कि हम विकास को मापते कैसे हैं?

सिर्फ पैसा विकास नहीं बताता

लंबे समय तक विकास की चर्चा में आय और आर्थिक उत्पादन को बहुत महत्व दिया गया। किसी क्षेत्र में कितना पैसा पैदा हो रहा है, कितने उद्योग हैं और लोगों की आय कितनी है, ये आज भी महत्वपूर्ण संकेतक हैं।

लेकिन केवल पैसे से यह नहीं पता चलता कि वहां रहने वाले व्यक्ति का जीवन वास्तव में कितना बेहतर है।

इसीलिए आधुनिक विकास सूचकांक स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर जैसी चीजों को भी देखते हैं।

भारत का National Multidimensional Poverty Index (MPI) भी गरीबी को केवल कम आय के रूप में नहीं देखता। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर की तीन प्रमुख dimensions के तहत पोषण, स्कूली शिक्षा, पेयजल, स्वच्छता, बिजली, आवास और दूसरी सुविधाओं जैसे 12 indicators को शामिल किया जाता है।

यानी विकास का सवाल केवल यह नहीं है:

आप कितना कमाते हैं?

सवाल यह भी है:

आप कितने स्वस्थ हैं, आपके बच्चों को कैसी शिक्षा मिलती है और आपका जीवन स्तर कैसा है?

तो पहाड़ कहां पीछे दिखाई देते हैं?

उत्तराखंड के संदर्भ में देखें तो पर्वतीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी चुनौतियों में रोजगार और आजीविका के अवसर शामिल हैं।

उत्तराखंड Human Development Report भी जीवन की गुणवत्ता को रोजगार और livelihood opportunities, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, basic civic services, infrastructure, पानी, पर्यावरण और forest resources जैसे कई पहलुओं से जोड़ती है।

पहाड़ में समस्या सिर्फ इतनी नहीं कि किसी गांव में कोई बड़ी कंपनी नहीं है।

समस्या तब गंभीर होती है जब रोजगार के लिए युवा को अपना गांव छोड़ना पड़े।

अच्छी उच्च शिक्षा के लिए बच्चे को शहर जाना पड़े।

गंभीर बीमारी में परिवार को कई घंटे दूर अस्पताल तक पहुंचना पड़े।

और रोजमर्रा की जरूरी सेवाओं के लिए भी लोगों को लंबी दूरी तय करनी पड़े।

इन पैमानों पर देखें तो शहरों की तुलना में बहुत से दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के सामने वास्तविक disadvantage है।

लेकिन क्या शहर हर पैमाने पर आगे हैं?

यहीं विकास की परिभाषा थोड़ी जटिल हो जाती है।

मान लीजिए दो परिवार हैं।

एक परिवार शहर में रहता है। उसके आसपास अस्पताल, स्कूल, बाजार और रोजगार उपलब्ध हैं।

दूसरा परिवार पहाड़ी गांव में रहता है। उसके आसपास जंगल, जल स्रोत और खेती की जमीन है, लेकिन अच्छे अस्पताल तक पहुंचने में कई घंटे लगते हैं और रोजगार के अवसर सीमित हैं।

इन दोनों में कौन ज्यादा विकसित है?

इसका जवाब केवल बैंक खाते में मौजूद पैसे या घर के आकार से नहीं दिया जा सकता।

पहले परिवार के पास services और economic opportunities ज्यादा हो सकती हैं।

दूसरे के पास natural resources और environmental advantages ज्यादा हो सकते हैं।

लेकिन प्राकृतिक सुंदरता अस्पताल की जगह नहीं ले सकती और अच्छी salary साफ हवा की।

इसीलिए दोनों को एक-दूसरे के विकल्प की तरह देखना भी गलत है।

पहाड़ की ताकत को भी पहचानना होगा

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों की सबसे बड़ी पूंजी हमेशा factories या commercial complexes नहीं रही।

यहां जंगल, जल, जैव विविधता, प्राकृतिक परिदृश्य, कृषि और स्थानीय संस्कृति जैसी संपदाएं मौजूद हैं।

इन संसाधनों का महत्व केवल पहाड़ तक सीमित नहीं है।

नदियों के catchment, forests और Himalayan ecosystems का प्रभाव पहाड़ से बहुत आगे तक जाता है।

समस्या यह है कि conventional development discussion में अक्सर ऐसी ecological services का मूल्य उतनी आसानी से दिखाई नहीं देता जितना किसी highway, mall या industrial project का।

एक सड़क बनने की लागत और आर्थिक फायदा रुपये में निकाला जा सकता है।

लेकिन किसी स्वस्थ जंगल द्वारा मिट्टी को बचाने, पानी को recharge करने या ecosystem को सहारा देने का मूल्य आम बातचीत में शायद ही उसी तरह दिखाई देता है।

लेकिन पहाड़ को romanticise करना भी गलत होगा

यह कहना आसान है कि पहाड़ में साफ हवा है, शांति है, जंगल हैं और इसलिए वहां का जीवन शहर से बेहतर है।

लेकिन किसी पहाड़ी परिवार से पूछिए जिसके गांव से अस्पताल कई किलोमीटर दूर है।

या उस युवा से जिसे नौकरी के लिए अपना घर छोड़ना पड़ा।

या उस परिवार से जिसके बच्चे की आगे की पढ़ाई गांव में संभव नहीं है।

उनके लिए केवल प्राकृतिक सुंदरता पर्याप्त विकास नहीं है।

पहाड़ की सुंदरता उसकी बुनियादी समस्याओं का विकल्प नहीं हो सकती।

यही कारण है कि विकास की नई सोच में पहाड़ को शहर बनाने की कोशिश करने के बजाय पहाड़ में अच्छी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, connectivity और digital access उपलब्ध कराने की जरूरत है।

शहरों की भी अपनी कीमत है

दूसरी तरफ शहरों में अवसर अधिक होने का अर्थ यह नहीं कि शहरी जीवन हर पैमाने पर बेहतर है।

तेजी से बढ़ते शहरों को congestion, pollution, महंगी housing, लंबी commuting और प्राकृतिक क्षेत्रों पर बढ़ते दबाव जैसी समस्याओं से जूझना पड़ता है।

यानी जिस आर्थिक गतिविधि को हम विकास का संकेत मानते हैं, उसके साथ कई नई समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं।

इसीलिए दुनिया भर में development को केवल income के बजाय quality of life से जोड़कर देखने की सोच मजबूत हुई है।

भारत का Multidimensional Poverty Index भी इसी व्यापक विचार को दर्शाता है। इसमें health, education और standard of living को एक साथ देखा जाता है।

फिर पहाड़ के लिए विकास का सही मॉडल क्या हो?

शायद सबसे बड़ी गलती यही होगी कि हम पहाड़ के विकास का मतलब उसे शहर जैसा बना देना मान लें।

हर पहाड़ी कस्बे को महानगर बनाने की जरूरत नहीं है।

लेकिन हर पहाड़ी व्यक्ति को अच्छी स्वास्थ्य सेवा मिलनी चाहिए।

अच्छी शिक्षा उपलब्ध होनी चाहिए।

सम्मानजनक रोजगार के विकल्प होने चाहिए।

सड़क और इंटरनेट तक भरोसेमंद पहुंच होनी चाहिए।

और इन सुविधाओं को विकसित करते समय जंगल, पानी, जमीन और पहाड़ की भौगोलिक सीमाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

यानी लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि:

“पहाड़ को शहर कैसे बनाएं?”

बल्कि सवाल होना चाहिए:

“शहर की जरूरी सुविधाएं पहाड़ तक कैसे पहुंचाएं, बिना पहाड़ की उन खूबियों को खत्म किए जिनकी शहरों में लगातार कमी होती जा रही है?”

आखिर कौन आगे और कौन पीछे?

इसका कोई एक जवाब नहीं है।

अगर पैमाना रोजगार, specialised healthcare, higher education और बाजार तक पहुंच है, तो कई पर्वतीय क्षेत्र शहरों से पीछे दिखाई देंगे।

लेकिन अगर चर्चा प्राकृतिक संसाधनों, ecological value और कम urban congestion की हो तो तस्वीर अलग हो सकती है।

इसीलिए विकास को केवल सड़क, मकान, बाजार और income से मापना अधूरा है।

विकास का बेहतर पैमाना यह होना चाहिए कि किसी व्यक्ति को अच्छा जीवन जीने के लिए कितने अवसर उपलब्ध हैं और उन अवसरों को पाने के लिए उसे अपना घर, समाज और पर्यावरण कितनी कीमत पर छोड़ना पड़ता है।

शायद इसलिए सही सवाल यह नहीं है कि:

“पहाड़ शहर से कितना पीछे है?”

बल्कि यह है:

“हमने विकास की परिभाषा ही शहर को देखकर क्यों बनाई?”

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