चकराता में बरसाती नाले पर ग्रामीणों ने बनाया अस्थायी पुल, वर्षों से स्थायी पुल की मांग

हर मानसून में ग्रामीणों को यही चुनौती झेलनी पड़ती है। वर्षों से स्थायी पुल की मांग के बावजूद अब तक समाधान क्यों नहीं निकल पाया, क्या है पूरा मामला?
Villagers carry and place a large wooden log across a seasonal stream to create a temporary bridge in Chakrata during the monsoon.

चकराता, 14 जुलाई। उत्तराखंड के चकराता क्षेत्र के छजाड़ खेड़ा नखारी गांव से सामने आया वीडियो पहाड़ के दूरस्थ गांवों की बुनियादी जरूरतों पर फिर सवाल खड़ा कर रहा है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ग्रामीण नाले पर लकड़ी और स्थानीय सामग्री की मदद से अस्थायी पुल बनाते दिखाई दे रहे हैं।

ग्रामीणों का दावा है कि गांव में स्थायी पुल की मांग लंबे समय से की जा रही है, लेकिन अब तक समाधान नहीं निकल पाया। बरसात के मौसम में नाला उफान पर आने से गांव के लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है। ऐसे में बच्चों के स्कूल जाने, लोगों के बाजार या अस्पताल पहुंचने और रोजमर्रा के जरूरी कामों में परेशानी बढ़ जाती है।

ग्रामीण मिलकर नाले के ऊपर अस्थायी रास्ता तैयार करते दिख रहे हैं। यह पहल गांव की सामूहिकता और मजबूरी दोनों को दिखाती है। ग्रामीणों का कहना है कि जब पानी का बहाव तेज होता है, तब आवाजाही जोखिम भरी हो जाती है और लोगों को कई बार जान जोखिम में डालकर रास्ता पार करना पड़ता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, हर मानसून में यही समस्या सामने आती है। सबसे अधिक दिक्कत बच्चों, बुजुर्गों, मरीजों और रोजाना बाहर जाने वाले लोगों को होती है। पुल नहीं होने से सामान्य दिनों की दूरी भी बरसात में बड़ा जोखिम बन जाती है।

ग्रामीणों की मांग है कि संबंधित विभाग मौके का निरीक्षण कर स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू करे। उनका कहना है कि अस्थायी पुल केवल कुछ समय की राहत दे सकता है, लेकिन तेज बारिश या नाले के उफान में यह व्यवस्था सुरक्षित नहीं मानी जा सकती।

यह मामला केवल एक गांव की परेशानी तक सीमित नहीं है। पहाड़ के कई दूरस्थ क्षेत्रों में सड़क, पुल और सुरक्षित संपर्क मार्ग अब भी लोगों की बड़ी जरूरत हैं। बरसात में ऐसे गांवों का संपर्क कमजोर पड़ जाता है और छोटी दूरी भी जोखिम भरी यात्रा में बदल जाती है।

ग्रामीणों की मेहनत सराहनीय है, लेकिन अस्थायी पुल किसी स्थायी सरकारी व्यवस्था का विकल्प नहीं हो सकता। किसी भी गांव को अपनी आवाजाही सुरक्षित करने के लिए खुद जोखिम उठाकर पुल बनाने की नौबत नहीं आनी चाहिए।

फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और ग्रामीणों के दावों पर आधारित है। प्रशासन या संबंधित विभाग की ओर से पुल की स्वीकृति, बजट या निर्माण प्रक्रिया पर आधिकारिक जानकारी सामने आने के बाद स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।

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