देहरादून की ग्राम पंचायत में RTI पर नहीं मिला विकास कार्यों का रिकॉर्ड, सूचना आयोग ने कार्रवाई के निर्देश दिए

सरकारी रिकॉर्ड केवल फाइलों का हिस्सा नहीं होते, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग की जवाबदेही का आधार भी हैं। दस्तावेज उपलब्ध न होने से विकास कार्यों की निगरानी, पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार—तीनों पर असर पड़ता है। अब देखना होगा कि विभाग रिकॉर्ड का पता कैसे लगाता है और जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है। क्या है पूरा मामला?
देहरादून स्थित उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग के कार्यालय भवन का मुख्य प्रवेश द्वार।

देहरादून, 14 जुलाई। देहरादून की एक ग्राम पंचायत में विकास कार्यों से जुड़े सरकारी दस्तावेज उपलब्ध न होने का मामला सामने आया है। वर्ष 2023-24 में हुए निर्माण कार्यों की लागत और उससे जुड़ी जानकारी RTI के तहत मांगी गई थी, लेकिन संबंधित अधिकारियों ने रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात कही।

मामला देहरादून के एक विकासखंड से जुड़ा है। एक व्यक्ति ने सूचना के अधिकार के तहत लोक सूचना अधिकारी से ग्राम पंचायत में हुए निर्माण कार्यों की लागत और अन्य संबंधित जानकारी मांगी थी। उचित जवाब न मिलने पर RTI आवेदक ने अपील दाखिल की।

सुनवाई के दौरान लोक सूचना अधिकारी ने आयोग को बताया कि जब उन्होंने कार्यभार संभाला, तब पूर्व अधिकारी ने मांगी गई सूचना से जुड़े दस्तावेज उन्हें नहीं दिए थे। अधिकारी के अनुसार, पूर्व अधिकारी ने यह भी बताया था कि संबंधित सूचना विभाग में उपलब्ध नहीं है।

राज्य सूचना आयुक्त कुशलानंद कोठियाल ने इस स्थिति को विभागीय स्तर पर गंभीर लापरवाही माना। आयोग ने कहा कि दस्तावेजों को तलाशने का कोई ठोस प्रयास नहीं किया गया। यदि दस्तावेज वास्तव में गुम थे, तो इस संबंध में FIR दर्ज कराई जानी चाहिए थी।

सूचना आयोग ने उच्चाधिकारियों को मामले में कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। आयोग का कहना है कि सरकारी विकास कार्यों से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा होते हैं और इन्हें सुरक्षित रखना विभागीय जिम्मेदारी है।

यह मामला ग्राम पंचायत स्तर पर रिकॉर्ड प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े करता है। निर्माण कार्यों की लागत, भुगतान और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध न होने से न केवल RTI प्रक्रिया प्रभावित होती है, बल्कि विकास कार्यों की निगरानी भी कमजोर पड़ती है।

RTI कानून का उद्देश्य नागरिकों को सरकारी कामकाज से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि विभाग यह कहकर सूचना उपलब्ध नहीं कराता कि रिकॉर्ड मौजूद नहीं है, तो जवाबदेही और दस्तावेज संरक्षण दोनों पर सवाल उठते हैं।

फिलहाल सूचना आयोग के निर्देशों के बाद विभागीय स्तर पर कार्रवाई की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। यह देखा जाएगा कि रिकॉर्ड क्यों उपलब्ध नहीं कराया गया, दस्तावेज किस स्तर पर सुरक्षित नहीं रखे गए और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी कैसे तय की जाती है।

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