पहाड़ में “एक भाऱा घास” केवल घास का गट्ठर नहीं होता।
यह रोजमर्रा के श्रम का ऐसा हिस्सा है,
जिसे अलग से गिना नहीं जाता,
लेकिन जिसके बिना घर की व्यवस्था चलना मुश्किल हो जाता है।
घास लाना दिन के तय कामों में शामिल रहता है।
सुबह के काम निपटाने के बाद
महिलाएँ जंगल या ढलानों की ओर निकलती हैं।
दूरी किसी तय स्थान तक सीमित नहीं होती।
जहाँ घास मिल जाए, वही जगह बन जाती है।
रास्ता सीधा नहीं होता,
बल्कि खड़ी चढ़ाई और ढलानों से होकर गुजरता है।
घास काटना आसान काम नहीं होता;
इसमें श्रम के साथ मौसम का सामना भी शामिल रहता है।
तेज़ धूप में पसीना बहता है,
बारिश में कपड़े भीग जाते हैं,
और ठंड में हाथ सुन्न होने लगते हैं,
फिर भी काम रुकता नहीं।
हाथ में दथुलू (दराँती),
पैर ढलान पर टिके हुए,
और शरीर का संतुलन बनाए रखते हुए
घास काटी जाती है।
एक-एक मुट्ठी जोड़कर
धीरे-धीरे पूरा भाऱा तैयार होता है।
जब घास इकट्ठी हो जाती है,
तो उसे रिंगाल के कंडों में भरकर
या रस्सी से बाँधकर
पीठ पर बोक कर लाया जाता है।
कई बार भाऱा इतना बड़ा होता है
कि उसे लेकर चलते समय शरीर दिखाई नहीं देता,
बल्कि पूरा शरीर उसी से ढक जाता है।
सिर्फ पैर
और थोड़ा-सा चेहरा नजर आता है।
वजन का कोई तय माप नहीं होता,
लेकिन एक सामान्य भाऱा इतना होता है
कि उसे लेकर सीधे खड़ा होना भी प्रयास जैसा लगता है।
इस भाऱे को लेकर वापस आना
ही असली कठिनाई बन जाता है।
ऊपर से नीचे उतरना जितना चुनौतीपूर्ण होता है,
उतना ही नीचे से ऊपर चढ़ना भी।
रास्ते में रुकना पड़ता है,
लेकिन रुकना भी आराम नहीं होता,
क्योंकि भाऱा को नीचे रखना
और फिर उठाना
अपने आप में अलग मेहनत है।
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इस पूरे काम में समय का बड़ा हिस्सा लगता है।
एक भाऱा घास लाने में कई बार आधा दिन निकल जाता है,
और यह काम जरूरत के अनुसार बार-बार करना पड़ता है।
यह घास केवल इकट्ठा करने के लिए नहीं,
बल्कि पशुओं के चारे के लिए होती है।
और पशु
पहाड़ के घर की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं।
इसलिए यह श्रम
सीधे घर की अर्थव्यवस्था से जुड़ा रहता है।
इस प्रक्रिया में कोई औपचारिक गणना नहीं होती।
न समय की,
न वजन की,
न दूरी की।
फिर भी यह एक नियमित और आवश्यक काम है,
जो हर दिन उसी तरह चलता रहता है।
आज सड़क, चारा और अन्य साधनों के आने से
यह काम पहले जैसा नहीं रहा।
फिर भी कई दूरस्थ गाँवों में
यह अब भी जारी है,
जहाँ महिलाएँ रोजाना घास काटकर भाऱा बनाती हैं
और उसे पीठ पर बोक कर घर तक लाती हैं।
कई घरों में यह दृश्य
हर दिन उसी सादगी से दिखता है।
माँ दथुलू लेकर निकलती हैं,
और लौटते समय उनकी पीठ पर रखा हुआ भाऱा
ऐसा लगता है,
जैसे वह केवल घास नहीं,
बल्कि घर का एक हिस्सा
अपने साथ लेकर आ रही हों।
आँगन तक पहुँचकर
वह भाऱा उतारती हैं,
उसे सीधा करती हैं,
और फिर बिना कुछ कहे
अपने अगले काम में लग जाती हैं।
उस समय यह सब सामान्य लगता है,
लेकिन बाद में समझ आता है
कि यह केवल चारा नहीं,
बल्कि चुपचाप निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।
इस लेख को लिखते समय
ऐसा महसूस होता है,
जैसे पृष्ठभूमि में
पहाड़ की वही परिचित धुन चल रही हो।
वे गीत
जिनमें रोजमर्रा के जीवन की छोटी-छोटी झलकियाँ दर्ज हैं।
Narendra Singh Negi के गीतों में भी ऐसे ही दृश्य मिलते हैं,
जहाँ घास का भाऱा,
पहाड़ की कठिन जीवन शैली,
और चुपचाप चलता श्रम
जीवन की स्वाभाविक लय का हिस्सा बन जाते हैं।
शायद इसी कारण
यह सब केवल देखा हुआ नहीं लगता,
बल्कि सुना हुआ भी लगता है।
जैसे किसी गीत की पंक्तियाँ,
जो बिना कहे बहुत कुछ कह जाती हैं।
जिनमें कहीं
पहाड़ की वे स्त्रियाँ दिखती हैं,
माँ, बहन, ब्वारी और बेटियाँ,
जो पहले भी इसी तरह
चुपचाप अपना हिस्सा निभाती रही हैं,
और कई जगहों पर आज भी निभा रही हैं।
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