ऋषिकेश, 7 जुलाई 2026। उत्तराखंड में भानियावाला-ऋषिकेश सड़क चौड़ीकरण परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। एक ओर इस परियोजना के लिए हजारों पेड़ों की कटाई को लेकर पर्यावरणीय चिंताएं और न्यायिक प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी ओर केंद्र सरकार ऋषिकेश शहर के बाहर से गुजरने वाले 12.67 किलोमीटर लंबे चार लेन बाइपास को मंजूरी दे चुकी है। ऐसे में अब यह सवाल उठ रहा है कि दोनों परियोजनाओं की भूमिका और प्राथमिकता को भविष्य में किस तरह देखा जाएगा।
भानियावाला से ऋषिकेश तक राष्ट्रीय राजमार्ग को चौड़ा करने की योजना के तहत बड़ी संख्या में पेड़ों के कटान की बात सामने आई है। अलग-अलग रिपोर्टों में यह संख्या करीब 3,300 से लेकर 4,000 से अधिक बताई गई है। प्रस्तावित मार्ग का हिस्सा शिवालिक एलीफेंट रिजर्व और संवेदनशील वन क्षेत्र से जुड़ा होने के कारण पर्यावरणविदों और स्थानीय नागरिकों ने इस पर आपत्ति जताई है।
मामला अदालत तक पहुंचने के बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी पेड़ों की कटाई और वन्यजीव गलियारों पर पड़ने वाले असर को लेकर सवाल उठाए। अदालत में यह मुद्दा भी उठा कि जहां संभव हो, वहां सड़क चौड़ीकरण के बजाय एलिवेटेड रोड या फ्लाईओवर जैसे विकल्पों पर विचार क्यों नहीं किया गया। कोर्ट ने सरकार और संबंधित एजेंसियों से परियोजना के पर्यावरणीय पहलुओं और विकल्पों पर जवाब मांगा था।
इसी बीच 31 मार्च 2026 को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने ऋषिकेश बाइपास परियोजना को तकनीकी, प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी दी। इस परियोजना की स्वीकृत लागत करीब 1,105.79 करोड़ रुपये है। प्रस्तावित बाइपास राष्ट्रीय राजमार्ग-7 पर टीनपानी फ्लाईओवर से शुरू होकर भट्टोवाला और ढालवाला होते हुए खरास्रोत पुल के पास जुड़ेगा।
करीब 12.67 किलोमीटर लंबे इस चार लेन बाइपास को ईपीसी मोड में बनाया जाना है। परियोजना को तीन वर्ष में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य चारधाम यात्रा, पर्यटन और लंबी दूरी के यातायात को ऋषिकेश शहर के भीड़भाड़ वाले हिस्से से बाहर निकालना है, ताकि स्थानीय लोगों और यात्रियों दोनों को राहत मिल सके।
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ऋषिकेश बाइपास को मंजूरी मिलने के बाद भानियावाला-ऋषिकेश सड़क चौड़ीकरण पर नई बहस शुरू हो गई है। सरकार और राष्ट्रीय राजमार्ग से जुड़े अधिकारी दोनों परियोजनाओं के उद्देश्य अलग-अलग बताते हैं। सड़क चौड़ीकरण का लक्ष्य राष्ट्रीय राजमार्ग की क्षमता बढ़ाना, जॉलीग्रांट एयरपोर्ट की कनेक्टिविटी सुधारना और भविष्य की यातायात जरूरतों को पूरा करना बताया जा रहा है। वहीं बाइपास का मकसद ऋषिकेश शहर के भीतर से गुजरने वाले यातायात को वैकल्पिक मार्ग देना है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि संवेदनशील वन क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई से पहले वैकल्पिक डिजाइन और पर्यावरणीय प्रभाव का व्यापक मूल्यांकन होना चाहिए। उनका तर्क है कि जब ऋषिकेश शहर के बाहर से यातायात निकालने के लिए बाइपास को मंजूरी मिल चुकी है, तो भानियावाला-ऋषिकेश चौड़ीकरण की जरूरत और डिजाइन पर नए सिरे से विचार किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर परियोजना से जुड़े पक्षों का कहना है कि भानियावाला-ऋषिकेश मार्ग केवल ऋषिकेश शहर के ट्रैफिक से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह जॉलीग्रांट एयरपोर्ट, चारधाम यात्रा, स्थानीय आवाजाही और भविष्य के यातायात दबाव से भी जुड़ा है। इसलिए बाइपास और मौजूदा सड़क चौड़ीकरण को अलग-अलग जरूरतों के रूप में देखा जाना चाहिए।
फिलहाल ऋषिकेश बाइपास परियोजना मंजूरी के बाद अगली प्रक्रियाओं की ओर बढ़ रही है। परियोजना अपडेट में इसके निर्माण को अगस्त 2026 से शुरू करने की संभावित समयसीमा भी सामने आई है। हालांकि, वास्तविक निर्माण शुरू होने की स्थिति निविदा, कार्यावंटन और जमीन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।
वहीं भानियावाला-ऋषिकेश सड़क चौड़ीकरण परियोजना पर्यावरणीय और कानूनी बहस के केंद्र में बनी हुई है। प्रस्तावित क्षेत्र में पेड़ों की कटाई, हाथी गलियारे और वैकल्पिक डिजाइन को लेकर सवाल अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। ऐसे में उत्तराखंड की इस महत्वपूर्ण सड़क परियोजना पर विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन की बहस अभी जारी है।
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