ऋषिकेश, 7 जुलाई 2026। ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल परियोजना के तहत बने डंपिंग जोन अब हरित क्षेत्र के रूप में विकसित किए जाएंगे। परियोजना का निर्माण कर रही आरवीएनएल 30 डंपिंग जोन में बड़े स्तर पर पौधरोपण अभियान चला रही है। इन क्षेत्रों को हरियाली से ढकने के साथ ढलानों को सुरक्षित करने के लिए भी अलग-अलग तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है।
रेल परियोजना के निर्माण के दौरान सुरंगों और अन्य कार्यों से बड़ी मात्रा में मलबा निकलता है। पहाड़ी क्षेत्रों में इस मलबे के सुरक्षित निस्तारण के लिए डंपिंग जोन बनाए जाते हैं। अब इन्हीं डंपिंग क्षेत्रों को खाली या अस्थिर छोड़ने के बजाय हरित क्षेत्र में बदलने की तैयारी की जा रही है।
डंपिंग जोन में स्थानीय जलवायु और पहाड़ी परिस्थितियों के अनुकूल पौधे लगाए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य यह है कि आने वाले समय में इन क्षेत्रों में प्राकृतिक हरियाली विकसित हो सके। इससे डंपिंग साइट की सतह को स्थिर करने और आसपास के पर्यावरण पर पड़ने वाले असर को कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
डंपिंग जोन के ढलान वाले हिस्सों पर जियो-जूट तकनीक का भी इस्तेमाल किया जा रहा है। इस तकनीक में ढलानों पर जूट आधारित सामग्री बिछाई जाती है, जिससे मिट्टी को पकड़ मिलती है। इसके बाद बीजों का छिड़काव किया जाता है, ताकि घास और पौधों का विकास हो सके। पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी तकनीक मिट्टी के कटाव को रोकने में सहायक मानी जाती है।
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मानसून के दौरान पहाड़ी ढलानों पर मलबे का बहाव और मिट्टी का कटाव बड़ी चुनौती बन जाता है। ऐसे में डंपिंग जोन का स्थिरीकरण जरूरी माना जाता है। यदि इन क्षेत्रों में समय पर पौधरोपण और ढलान सुरक्षा के काम पूरे होते हैं, तो इससे भूस्खलन की आशंका कम करने और डंपिंग साइट को सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
ऋषिकेश-कर्णप्रयाग नई रेल लाइन परियोजना उत्तराखंड की महत्वपूर्ण रेल परियोजनाओं में शामिल है। यह परियोजना 125 किलोमीटर लंबी है और देहरादून, टिहरी गढ़वाल, पौड़ी गढ़वाल, रुद्रप्रयाग और चमोली जिलों से होकर गुजरती है। परियोजना का बड़ा हिस्सा सुरंगों से होकर गुजरता है, जिसमें 16 मेन लाइन टनल और 12 एस्केप टनल शामिल हैं।
पहाड़ी भूगोल और संवेदनशील ढलानों के कारण इस परियोजना में निर्माण के साथ पर्यावरणीय सावधानियों पर भी जोर दिया जा रहा है। परियोजना में मलबा निस्तारण योजना पहले से अहम हिस्सा रही है। अब डंपिंग जोन को हरित क्षेत्र में बदलने की पहल इसी दिशा में एक जरूरी कदम मानी जा रही है।
स्थानीय स्तर पर भी बड़े निर्माण कार्यों के दौरान डंपिंग जोन और मलबा निस्तारण हमेशा संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में पौधरोपण, जियो-जूट और ढलान स्थिरीकरण जैसे उपायों से निर्माण क्षेत्रों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, इसका वास्तविक असर आने वाले समय में पौधों की वृद्धि और डंपिंग साइट की स्थिरता पर निर्भर करेगा।
आरवीएनएल की यह पहल सफल रहती है, तो रेल परियोजना के निर्माण से प्रभावित डंपिंग क्षेत्रों को धीरे-धीरे हरियाली वाले सुरक्षित जोन में बदला जा सकेगा। इससे निर्माण कार्य और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में मदद मिलेगी।
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