काशीपुर, 24 जून। उत्तराखंड के घरों में पीढ़ियों से इस्तेमाल होने वाला पिस्यूं लूण अब देश-विदेश तक अपनी पहचान बना रहा है। इस पारंपरिक पहाड़ी नमक को नई पहचान दिलाने का काम शशि बहुगुणा रतूड़ी ने किया है। उन्होंने पहाड़ की रसोई के इस स्वाद को आधुनिक पैकेजिंग और ऑनलाइन बाजार से जोड़कर न सिर्फ अपना कारोबार खड़ा किया, बल्कि कई महिलाओं और स्थानीय किसानों को भी रोजगार से जोड़ने की राह बनाई।
शशि रतूड़ी के इस उद्यम को आईआईएम काशीपुर के FIED यानी Foundation for Innovation & Entrepreneurship Development से भी 20 लाख रुपये की सहायता मिली है। यह राशि राष्ट्रीय कृषि विकास योजना-रफ्तार, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के अंतर्गत दी गई है। उनके पिस्यूं लूण की मांग अब देश के साथ-साथ विदेशों तक पहुंच चुकी है।
FIED, आईआईएम काशीपुर का उद्यमिता विकास केंद्र है, जो नए स्टार्टअप और उद्यमियों को मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और वित्तीय सहयोग उपलब्ध कराने में मदद करता है।
उद्यम से जुड़े विवरणों के अनुसार, शशि बहुगुणा रतूड़ी अपने ब्रांड ‘नमकवाली’ के जरिए पहाड़ी पिस्यूं लूण को लोगों तक पहुंचा रही हैं। यह नमक उत्तराखंड के पहाड़ी घरों में लंबे समय से बनाया जाता रहा है। पारंपरिक रूप से इसे सिलबट्टे पर नमक, लहसुन, अदरक, हींग-जीरा, मिर्च और अन्य स्थानीय मसालों के साथ पीसकर तैयार किया जाता है।
पहाड़ों में पिस्यूं लूण को रोटी, दही, खीरा, ककड़ी, सब्जी और सामान्य भोजन के साथ बड़े चाव से खाया जाता है। शशि रतूड़ी ने इसी घरेलू स्वाद को बाजार की जरूरतों के हिसाब से तैयार किया। पैकेजिंग, ब्रांडिंग और ऑनलाइन बिक्री के जरिए यह उत्पाद उत्तराखंड से निकलकर देश के अलग-अलग शहरों और विदेशों में रहने वाले लोगों तक पहुंचने लगा।
यह भी पढ़ें: लखनऊ अग्निकांड के बाद उत्तराखंड में अलर्ट, अस्पतालों, मॉल और होटलों का होगा फायर सेफ्टी ऑडिट
शशि रतूड़ी की पहल केवल नमक बेचने तक सीमित नहीं रही। उनके साथ पहाड़ की कई महिलाएं पिस्यूं लूण, मसाले, चटनी और अन्य पारंपरिक उत्पाद तैयार करने के काम से जुड़ी हैं। इससे महिलाओं को गांव और घर के आसपास रोजगार का अवसर मिला है। साथ ही स्थानीय किसानों से मसाले और अन्य सामग्री लेने से पहाड़ी उत्पादों को भी बाजार मिल रहा है।
उनके इस प्रयास को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली। शशि बहुगुणा रतूड़ी अपने ब्रांड के साथ Shark Tank India तक पहुंचीं, जहां पहाड़ी उत्पादों और महिला उद्यमिता की उनकी कहानी चर्चा में रही। इसके बाद नमकवाली और पहाड़ी पिस्यूं लूण को लेकर लोगों की दिलचस्पी और बढ़ी।
उत्तराखंड के लिहाज से यह कहानी इसलिए खास है, क्योंकि इसमें पहाड़ की परंपरा, स्थानीय स्वाद, महिला मेहनत और आधुनिक कारोबार एक साथ जुड़ते हैं। शशि रतूड़ी ने पिस्यूं लूण को केवल रसोई का हिस्सा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे पहाड़ की पहचान, आजीविका और आत्मनिर्भरता की मिसाल बना दिया।
यह भी पढ़ें: वन विभाग और वन विकास निगम के दैनिक श्रमिकों को राहत, 10 साल की सेवा पर मिलेगा 18 हजार रुपये मानदेय




